दसघरा की दस कहानियां—मनसा-मोहनी

दसघरा की दस कहानियां—

हमारा गांव करीब 14वीं शताब्दी में दिल्ली के इस बीहड़ इलाके में आकर बसा था। जहां आज हम रहते है वो दसघरा गांव। इससे पहले कहते है कहीं सिंध प्रांत से चल कर दोनों भाई आये थे। पहले कुछ दिन ये दोनों भाई पास के बिजवासन गांव में रहे परंतु वहां के जाट भाई राणा है वह भी बहुत लड़के है इस लिए एक म्यान में दो तलवार से बेहतर है वो दोनों भाई आगे आ गए। एक यहां रह गया जिसका नाम मामन था हमारा पूरा गांव एक ही भाई की सन्तान है। दूसरा आगे चला गया। नंगली गांव जहां कभी मनोज कुमार की उपकार फिल्म की शूटिंग हुई थी। दिल्ली के आस पास हम दो ही गांव है जहां पर तुसीड़ गौत्र है। वरना तो आस पास, दहिया, दलाल, डबास, सौलंकी या राणा ही पाये जाते है।

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(एक अभुतपूर्व यात्रा)

कठोपनिषदओशो

आज हम एक ऐसी यात्रा पर चले है। जो पथ हजारों साल बाद भी उतना ही….साफ सुथरा और रमणीक है। वैसे तो भारत के अध्‍यात्‍म जगत में न जाने कितने हीर-मोती-पन्‍ने…भरे पड़े है। न जाने कितने चाँद सितारे जो संत बन कर चमक रहे है। जिनका प्रकाश सदियों से मनुष्‍य को पथ दिखाता रहा है….ओर करोड़ो सालों तक दिखाता रहेगा।

लेकिन उन सब में उपनिषद अदुत्‍य है। बेजोड़ है….जिनका कोई सानी नहीं है। आज से आप जगमगाते उन उपनिषदों को ओशो के वचनों से जीवित होता हुआ पाओगे। जो सालों से उन पर पड़ धूल-धमास। हटा को उनका अर्थ हमारे सामने लाये है मानों वो दोबारा जीवित हो गये है। आज कि यात्रा सुखद तो होगी ही इसके साथ हम आध्यात्मिक के उन गहरे रहस्यों को भी बार-बार छूते चले जायेंगे।

      नचिकेता और यम का संवाद। Continue reading “(एक अभुतपूर्व यात्रा)”

तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-प्रवचन-10

तंत्रा-विजन—(भाग-एक)

दसवां—प्रवचन—(हिंगल डे जिबिटी डांगली जी)

दिनांक-30 मार्च 1977

पहला प्रश्न: यह प्रभा का प्रश्न है: प्रिय ओशो, हिंगल डे जे, विपिटी डांग जांग—डो रन नन, डे जुन बुंग।

हिंगल डे जिबिटी डांगली जी?  

     यह अत्यंत सुंदर है, प्रभा! यह सौन्दर्य पूर्ण है। यह बहुत बढियां है, बच्ची। मैं तुम्हें स्थिर बुद्धि बनाए जा रहा हूं। बस एक कदम और…और संबोधि

दूसरा प्रश्न: क्या प्रार्थना उपयोगी है? यदि हां, तो मुझे सिखादें कि कैसे करूं। मेरा तात्पर्य है, प्रार्थना ईश्वर के प्रेम को प्राप्त करने के लिए, उसके प्रसाद को अनुभव करने के लिए।

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तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-प्रवचन-09

तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision—(सरहा के गीत)-भाग-पहला

नौवां—प्रवचन—(अपने में थिर निष्कलंक मन)

दिनांक-29 मार्च 1977 ओशो आश्रम पूना)  

सुत्र:

जब (शिशिर में) छेड़ता है निश्चल जल को समीर

बन हिम ग्रहण कर लेता है वह

आकृति और बनावट किसी चट्टान सी

जब होता मन व्यथित है व्याख्यात्म विचारों से

जो अभी तक था एक अनाकृत सौम्य सा

बन वही जाता है कितना ठोस और कठोर।

अपने में थिर निष्कलंक मन कभी नहीं होगा दूषित

संसार या निर्वाण की अपवित्रताओं से भी

कीचड़ में पड़ा एक कीमती रतन ज्यों

चमकेगा नही यद्यपि है उसमें कांति।

ज्ञान चमकता नहीं है अंधकार में,

पर अंधकार जब होता है प्रकाशित,

पीड़ा अदृश्य हो जाती है(तुरंत)

शाखाएं-प्रशाखएं उग आती है बीज से

पुष्प पल्वित होते नुतपात शाखाओं से।

जो कोई भी सोचता-विचारा है

मन को एक या अनेक, फेंक देता है

वह प्रकाश को और प्रवेश करता है संसार में

जो चलता है (प्रचण्ड) अग्नि मे खुली आंख

तब किस और होगी करूण की आवश्यकता अधिक।

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तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-प्रवचन-08

तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision—(सरहा के गीत)-भाग-पहला

(आठवां—प्रवचन) प्रेम के प्रति सच्चे रहो

दिनांक-28 मार्च 1977 ओशो आश्रम पूना।) 

सुत्र:

पहला प्रश्न: ओशो, मैं एक मेढक हूं: मैं जानता हूं कि मैं एक मेढक हूं, क्योंकि मैं धुंधले, गहरे पानी में तैरना और चिपचिपी कीचड़ में उछलना-कूदना पसंद करता हूं। और यह मधु क्या होता है? यदि एक मेढक अस्तित्व की एक अनादृत दशा में हो सके, क्या वह एक मधुमक्खी बन जाएगा?

निश्चय ही! मधुमक्खी बन जाना हर किसी की संभावना है। हर कोई मधुमक्खी हो जाने में विकसित हो सकता है। एक अनावृत, जीवंत, स्वस्फूर्त जीवन, क्षण-क्षण वाला जीवन, इसका द्वार है, इसकी कुंजी है। यदि कोई ऐसा जी सके कि वह जीना अतीत से न हो, तब वह मधुमक्खी है, और तब चारों तरफ मधु ही मधु है।

‘मेढक’ से सराह का तात्पर्य एक ऐसे व्यक्ति से है जो अतीत से जीता है, जो अपनी अतीत की स्मृतियों के पिंजड़े में कैद रहता है। जब तुम अतीत में जीते हो, तुम बस जीने का आभास मात्र देता है। वास्तव में तुम जीते नहीं हो। जब तुम अतीत में जीते हो, तुम एक यंत्र की भांति जीते हो। एक मनुष्य की भांति नहीं। जब तुम अतीत से जीते हो, यह जीना एक पुनरावृति होता है। एक नीरस पुनरावृति–तुम जीवन और अस्तित्व के आह्लाद से, आनंद से चूक रहे होते हो। वहीं तो ‘मधु’ है: जीवन का आनंद, बस यहां-अभी होने का माधुर्य, बस होने में समर्थ हो पाने की मधुरता। वह आनंद ही मधु है…और चारों तरफ लाखों फूल खिल रहे हैं। सारा अस्तित्व फूलों से भरा है।

मैं जानता हूं कि किसी मेढक को यह बात समझा पाना कठिन है। प्रश्न सही है: ‘और यह मधु क्या होता है?’ मेढक ने इसके विषय में कभी जाना नहीं होता। और वह ठीक उसी पौधे की जड़ के समीप रहता है, जहां कि फूल खिलते हैं, और मक्कियाँ मधु एकत्रित करती है, पर वह कभी उस आयाम में गया ही नहीं है।

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तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-प्रवचन-07

तंत्रा-विजन-(सरहा के गीत)-भाग-पहला

सातवां प्रवचन-(सत्य न पवित्र है न अपवित्र)

(दिनांक 27 अप्रैल 1977 ओशो आश्रम पूना।) 

सूत्र:

यह है प्रारंभ में, मध्य में, और अंत में

फिर भी अंत व प्रारंभ हैं नहीं और कहीं

जिनके मन भ्रमित हैं, व्याख्यात्मक विचारों से

वह सब हैं दुविधा में, इसीलिए

शून्य और करूणा को वे दो समझते है।

मधु-मक्खियां जानती है, मधु मिलेगा फूलों में

कि नहीं हैं दो, संसार और निर्वाण

भ्रमित लोग समझेंगे पर कैसे यह

भ्रमित कोई जब झांकते हैं किसी दर्पण में

प्रतिविम्ब नहीं, देखते हैं, वे एक चेहरा

वैसे ही जिस मन ने सत्य को नकारा हो

भरोसा वह करता है उस पर जो नहीं है सत्य

यद्यपि छू सकता नहीं कोई सुगंध फूलों की

है यह सर्वव्यापी और एकदम अनुभवगम्य

वैसे ही अनाकृत मन स्वतः

पहचान जाते हैं रहस्यपूर्ण वृतों की गोलाई को

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तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-प्रवचन-06

तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision-(सरहा के गीत)-भाग-पहला  

छठवां—प्रवचन (मैं एक विध्वंसक हूं)  

(दिनांक 26 अप्रैल 1977 ओशो आश्रम पूना।) 

पहला प्रश्न: ओशो, मैंने इधर हाल ही में संबोधि के विषय में दिव्य-स्वप्न देखने शुरू किए हैं, जो कि प्रेम व प्रसिद्धि के दिव्य-स्वप्नों से भी अधिक मनोरम हैं। क्या आप दिव्य-स्वप्न देखने के ऊपर कुछ कहेंगे?

यह प्रश्न प्रेम पंकज का है। जहां तक प्रेम और प्रसिद्धि का संबंध है, दिव्य-स्वप्न देखना पूर्णता सही है–वे स्वप्न-संसार के ही अंग है। तुम जितने चाहो स्वप्न देख सकते हो। प्रेम एक स्वप्न है, ऐसे ही प्रसिद्धि भी, वे स्वप्न के विपरीत नहीं हैं। सच तो यह है कि जब स्वप्न देखना बंद हो जाता है, तो वे भी गायब हो जाते है। उनका असित्व उसी आयाम में है, सपनों के आयम में।

सपना तो अंधकार की भांति है। यह तभी तक रहता है जब तक कि प्रकाश नहीं होता है। जब प्रकाश फे लता है, अंधकार बस वहां से विलीन हो जाता है, वह पल भर भी वहां रह नहीं सकता। सपना इसलिए है क्योंकि जीवन अंधकार पूर्ण, फीका और उदासीन है। सपना तो तुम्हारी एक पूरकता जैसा होता है। क्योंकि असली प्रसन्नता तो हमारे पास है ही नहीं। इसलिए उसके विषय में हम केवल सपना ही तो देख सकते है। क्योंकि सच में हमारे पास जीवन में कुछ है ही नहीं, यह सत्य हमें बड़ी पीड़ा देता है, तब इस सत्य को हम कैसे सहन कर पाएगे? यह एकदम असहनीय हो जाता है। सपने इसे सहनीय बना देते है। सपने हमारी सहायता करते है। वे हमसे कहते हैं, ‘ठहरो! जरा आज सब कुछ ठीक नहीं है? परंतु तुम चिंता मत करो, कल देखना हर चीज ठीक हो जाएगी। हर कार्य तुम्हारी सोच की तरह से होगा। बस कुछ तुम्हें प्रयत्न करना होगा, शायद अभी उतना प्रयास न किया जितना की करना चाहिए था, चलों कोई बात नहीं, तुम्हारे भाग्य ने तुम्हारा साथ न दिया होगा। कुछ परिस्थियां तुम्हारे विपरित रही होंगी। परंतु तुम घबड़ाओ मत, सदा तो ऐसा नहीं होगा। और देखना ईश्वर बड़ा करुणावान है, दयालु है, संसार के सभी धर्म कहते है कि ईश्वर बड़ा दयालु है, बड़ा करुणावान है। यह आशा की धुंधलका तुम्हें घेरे ही रहता है। तुम उससे बाहर देख ही नहीं सकते।

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तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-प्रवचन-05

तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision-(सरहा के गीत) भाग-पहला

पांचवां-प्रवचन-(मनुष्य एक कल्पना है)

(दिनांक 25 अप्रैल 1977 ओशो आश्रम पूना।) 

सूत्र:

सड़े मांस की गंध पर रीझने वाली मक्खी को

चंदन की सुगंध भी, जान पडती है दुर्गंध

प्राणी जो तज देते है निर्वाण

लोलुप हो जाते हैं क्षुद्र संसारिक विषयों के

जल से भरे ताल में बैल के पदचिंह

जल्दी ही हो जाते हैं शुष्क, वैसे ही वह दृढ़ मन

जो भरपूर है उन गुणों से जो है अपूर्ण

शुष्क हो जाएंगी ये अपूर्णताएं समय पर

समुद्र का नमकीन जल जैसे हो जाता है मधुर,

जब पी लेते है मेघ उसे

वैसे ही वह स्थिर मन, काम जो करता है

औरों के हेतु बना देता है अमृत

उन एंन्द्रिक-विषयों के विष को

यदि वर्णनातित घटे, कभी नहीं रहता कोई असंतुष्ट

यदि अकल्पनिय, होगा यह स्वयं आनंद ही

यद्यपि भय होता है मेघ से तड़ित का

फसलें पकती है जब यह बरसता है जल

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तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-प्रवचन-04

तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision-(सरहा के गीत)-भाग-पहला

चौथा-प्रवचन-(प्रेम एक मृत्यु है)  

(दिनांक 24 अप्रैल 1977 ओशो आश्रम पूना।) 

पहला प्रश्न: ओशो, आप में वह सब-कुछ हैं जो मैंने चाहा था, या जो मैंने कभी चाही या मैं कभी चाह सकती थी। फिर मुझ में आपके प्रति इतना प्रतिरोध क्यों है?

शायद इसी कारण–यदि तुममें मेरे प्रति गहन प्रेम है तो गहन प्रतिरोध भी होगा। वे एक-दूसरे को संतुलित करते हैं। जहां कहीं पर प्रेम है, वहां प्रतिरोध तो होगा ही। जहां कहीं भी तुम बहुत अधिक आकर्षित होते हो, तुम उस स्थान से, उस जगह से भाग जाना भी चाहोगे–क्योंकि अत्यधिक आकर्षित होने का अर्थ है कि तुम अतल गहराई में गिरोगे, जो तुम स्वयं हो वह फिर न रह सकोगे।

प्रेम खतरनाक है। प्रेम एक मृत्यु है। यह स्वयं मृत्यु से भी बड़ा घातक है, क्योंकि मृत्यु के बाद तो तुम बचते हो लेकिन प्रेम के बाद तुम नहीं बचते। हां, कोई होता है परंतु वह दूसरा ही होता है, आपमें कुछ नया पैदा होता है। परंतु तुम तो चले गए इसलिए भय है।

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तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-प्रवचन-03

तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision-(सरहा के राजगीत) (भाग-एक)

तीसरा प्रवचन—(मधु तुम्हारा है)  

(दिनांक 23 अप्रैल 1977 ओशो आश्रम पूना।)  

एक मेध की तरह, जो उठता है समुंद्र से

अपने भीतर समाएं वर्षा को,

करती हो आलिंगन घरती जिसका,

वैसे ही, आकाश की भांति

समुंद्र भी उतना ही रहता है,

न बढ़ता, न घटता है।

अतः, उस स्वच्छंदता से जो कि है अद्वितीय

बुद्ध की पूर्णमाओं से भरपूर

जन्मती हैं चेतनाएं सभी

और आती है विश्राम हेतु वहीं

पर यह साकार है न निराकार है

वे करते हैं विचरण अन्य मार्गों पर

और गंवा बैठते हैं सच्चे आनंद को

उद्धीपक जो निर्मित करते है, खोज में उन सुखों की

मधु है उसके मुख में, इतना समीप…

पर हो जाएंगा अदृश्य, यदि तुरंत ही न करले वे उसका पान

पशु नहीं समझ पाते कि संसार है दुख,

पर समझते हैं वे विद्वान तो

जो पीते हैं इस स्वर्मिक अमृत को

जबकि पशु भटकते फिरते हैं

एंद्रिंक सुखों के लिए 

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तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision -भाग-01)-प्रवचन-02

तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision: (सरहा के गीत) भाग-पहला

दूसरा प्रवचन-The goose is out!-(हंस बाहर है)

(दिनांक 22 अप्रैल 1977 ओशो आश्रम पूना।) 

प्रश्नचर्चा-

पहला प्रश्न: ओशो, शिव का मार्ग भाव का है, हृदय का है। भाव को रूपांतरित करना है। प्रेम को रूपांतरित करना है ताकि यह प्रार्थना हो जाए। शिव के मार्ग में तो भक्त और मूर्ति रहते हैं, भक्त और भगवान रहते हैं। आत्यंतिक शिखर पर वे दोनों एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। इसे ध्यान से सून लो: जब शिव का तंत्र अपने आत्यंतिक आवेग में पहुंचता है, ‘मैं’ ‘तू’ में विलीन हो जाता है, और ‘तू- मैं’ में विलीन हो जाता है–वे साथ-साथ होते हैं, वे एक इकाई हो जाते हैं।

जब सरहा का तंत्र अपने आत्यंतिक शिखर पर पहुंचता है, तब यह पता चलता है: न तुम हो, न तुम सत्य हो, न तुम्हारा अस्तित्व है, न तुम सही हो, न तुम्हारा अस्तित्व है, और न ही मेरा, दोनों ही वहां विलीन हो जाते हैं। दो शून्य मिलते हैं–मैं नही, तू नहीं, न तू न मैं। दो शून्य, दो रिक्त आकाश एक दूसरे में विलीन हो जाते हैं, क्योंकि सरहा के मार्ग पर सारा प्रयास यही है, कि विचार को कैसे विलीन किया जाए, और मैं और तू दोनों विचार के ही अंग हैं।

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तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision -भाग-01)-प्रवचन-01

तंत्रा-विजन-(सरहा के गीत)-भाग-पहला

पहला-प्रवचन–(One whose arrow is shot) (जिसका एक तीर नीशाने पर)

(सरहा के पदों पर दिए गए ओशो के अंग्रेजी प्रवचनों का दिनांक 21 अप्रैल, 1977 ओशो सभागार, पूना में दिये गए बीस अमृत प्रवचनों में से पहले दस प्रवचनों तथा उसके शिष्यों द्वारा प्रस्तुत प्रश्नों के उत्तरों का हिंदी अनुवाद)

सूत्र:

महान मंजुश्री को मेरा प्रणाम,

प्रणाम हैं उन्हें

जिन्होंने किया सीमित को अधीन

जैसे पवन के आघात से

शांत जल में उभर आती है, उतंग तरंगें,

ऐसे ही देखते हो सरहा

अनेक रूपों में, हे राजन!

यद्यपि है वह एक ही व्यक्ति।

भेंगा है जो मूढ़

दिखते उसे एक नहीं, दो दीप,

जहां दृश्य और द्रष्टा नहीं दो,

अहा! मन करता संचालन

दोनों ही पदार्थगत सत्ता का।

गृहदीप यद्यपि प्रज्वलित,  जीते अंधेरे में नेत्रहिन,

सहजता से परिव्याप्त सभी,

निकट वह सभी के,

पर रहती सब परे मोहग्रस्त के लिए।

सहजता से परिव्याप्त सभी, निकट वह सभी के,

पर रहती सदा परे मोहग्रस्त के लिए।

सरिताएं हो अनेक, यद्यपि,

सागर मे मिल होती है एक,

हों झूठ अनेक परंतु

होगा सत्य एक, विजयी सभी पर।

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तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-ओशो

तंत्रा-विजन-(Tantra Vision)-भाग-पहला (हिन्दी अनुवाद)

(सरहा के पदों पर दिए गए ओशो के अंग्रेजी प्रवचनों Tantra Vision का दिनांक 21 अप्रैल, 1977 ओशो सभागार, पूना में दिये गए बीस अमृत प्रवचनों में से पहले दस प्रवचनों तथा उसके शिष्यों द्वारा प्रस्तुत प्रश्नों के उत्तरों का हिंदी अनुवाद)

……….  तंत्र कहता है: किसी चीज की निंदा न करो, निंदा करने की वृत्ति ही मूढ़तापूर्ण है। निंदा करने से तुम अपने विकास की पूरी संभावना रोक देते हो। कीचड़ की निंदा न करो, क्योंकि उसी में कमल छिपा है। कमल पैदा करने के लिए कीचड़ का उपयोग करो। माना कि कीचड़ अभी तक कीचड़ है कमल नहीं बना है, लेकिन वह बन सकता है। जो भी व्यक्ति सृजनात्मक है, धार्मिक है, वह कमल को जन्म देने में कीचड़ की सहायता करेगा, जिससे कि कमल की कीचड़ से मुक्ति हो सके।

सरहा तंत्र-दर्शन के प्रस्थापक हैं। मानव-जाति के इतिहास की इस वर्तमान घड़ी में जब कि एक नया मनुष्य जन्म लेने के लिए तत्पर है, जब कि एक नई चेतना द्वार पर दस्तक दे रही है, सरहा का तंत्र-दर्शन एक विशेष अर्थवत्ता रखता है। और यह निश्चित है कि भविष्य तंत्र का है, क्योंकि द्वंदात्मक वृत्तियां अब और अधिक मनुष्य के मन पर कब्जा नहीं रखा सकतीं। इन्हीं वृत्तियों ने सदियों से मनुष्य को अपंग और अपराध-भाव से पीड़ित बनाए रखा है। इनकी वजह से मनुष्य स्वतंत्र नहीं, कैदी बना हुआ है। सुख या आनंद तो दूर इन वृत्तियों के कारण मनुष्य सर्वाधिक दुखी है। इनके कारण भोजन से लेकर संभोग तक और आत्मीयता से लेकर मित्रता तक सभी कुछ निंदित हुआ है। प्रेम निंदित हुआ, शरीर निंदित हुआ, एक इंच जगह तुम्हारे खड़े रहने के लिए नहीं छोड़ी है। सब-कुछ छीन लिया है और मनुष्य को मात्र त्रिशंकु की तरह लटकता छोड़ दिया है ।

मनुष्य की यह स्थिति अब और नहीं सही जा सकती। तंत्र तुम्हें एक नई दृष्टि दे सकता है, इसीलिए मैंने सरहा को चुना है। मुझे जिससे बहुत प्रेम है सरहा उनमें से एक है, यह मेरा उनके साथ बड़ा पुराना प्रेम-संबंध है। तुमने शायद सरहा का नाम भी न सुना हो, परंतु वे उन व्यक्तियों में से हैं जिन्होंने जगत का बड़ा कल्याण किया हो ऐसे अंगुलियों पर गिने जाने वाले दस व्यक्तियों में मैं सरहा का नाम लूंगा, यदि पांच भी ऐसे व्यक्ति गिनने हों तो भी मैं सरहा को नहीं छोड़ पाऊंगा।

सरहा के इन पदों में प्रवेश करने से पहले कुछ बातें सरहा के जीवन के विषय में जान लेनी आवश्यक हैं। सरहा का जन्म विदर्भ महाराष्ट्र…का ही अंग है, पूना के बहुत नजदीक। राजा महापाल के शासनकाल में सरहा का जन्म हुआ। उनके पिता बड़े विद्वान ब्राह्मण थे और राजा महापाल के दरबार में थे। पिता के साथ उनका जवान बेटा भी दरबार में था। सरहा के चार और भाई थे, वे सबसे छोटे परंतु सबसे अधिक तेजस्वी थे। उनकी ख्याति पूरे देश में फैलने लगी और राजा तो उनकी प्रखर बुद्धिमत्ता पर मोहित सा हो गया था।

चारों भाई भी बड़े पंड़ित थे परंतु सरहा के मुकाबले में कुछ भी नहीं। जब वे पांचों बड़े हुए तो चार भाइयों की तो शादी हो गई, सरहा के साथ राजा अपनी बेटी का विवाह रचाना चाहता था। परंतु सरहा सब छोड़-छाड़ कर संन्यास लेना चाहते थे। राजा को बड़ी चोट पहुंची, उसने बड़ी कोशिश की सरहा को समझाने की–वे थे ही इतने प्रतिभाशाली और इतने सुंदर युवक। जैसे-जैसे सरहा की ख्याति फैलने लगी वैसे राजा महापाल के दरबार की भी ख्याति सारे देश में फैलने लगी। राजा को बड़ी चिंता हुई, वह इस युवक को संन्यासी बनते नहीं देखना चाहता था। वह सरहा के लिए सब-कुछ करने को तैयार था। परंतु सरहा ने अपनी जिद न छोड़ी और उसे अनुमति देनी पड़ी। वह संन्यासी बन गया, श्री कीर्ति का शिष्य बन गया।………

ओशो

मनुष्य होने की कला–(A bird on the wing)-प्रवचन-11

सजग,शांत और संतुलित बने रहोप्रवचन-ग्याहरवां

मनुष्य होने की कला–(The bird on the wing)-ओशो की बोली गई झेन और बोध काथाओं पर अंग्रेजी से हिन्दी में रूपांतरित प्रवचन माला)

कथा: –

भिक्षु जुईगन अपना प्रत्येक दिन स्वयं अपने आप मैं जोर-जोर से-

यह कहते हुए ही शुरू करता था- ”मास्टर! क्या तुम हो वहां?’’

और वह स्वयं ही उसका उत्तर भी देता था- ” जी हां श्रीमान? मैं हूं। ”

तब वाह कहता- ” अच्छा यही है- सजग, शांत और संतुलित बने रहो।”

और वह लौट कर जवाब देता—‘’जी श्रीमान? मैं यही करूंगा ”

तब वह कहता- ”और अब देखो वे कहीं तुझे बेवकूक न बना दें।‘’

और वह ही उसका उत्तर देता- ”अरे नहीं श्रीमान? मैं नहीं बगूंगा

मैं हरगिज नहीं बनूंगा?

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मनुष्य होने की कला–(A bird on the wing)-प्रवचन-10

मौन का सदगुरुप्रवचन-दसवां

मनुष्य होने की कला–(The bird on the wing)-ओशो की बोली गई झेन और बोध काथाओं पर अंग्रेजी से हिन्दी में रूपांतरित प्रवचन माला)

कथा: –

बुद्ध को एक दिन अपने प्रवचन के द्वारा एक विशिष्ट सन्देश देना

था और चारों ओर मीलों दूर से हजारों अनुयायी आए हुए थे) जब

बुद्ध पधारे तो वे अपने हाथ में एक फूल लिए हुए थे। कुछ समय बीत

गया लेकिन बुद्ध ने कुछ कहा नहीं वह बस फूल की ही ओर देखते

रहे। पूरा समूह बेचैन होने लगा, लेकिन महाकाश्यप बहुत देर तक

अपने को रोक न सका, हंस पड़ा। बुद्ध ने हाथ से इशारा कर उसे

अपने पास बुलाया। उसे वह फूल सौंपा और सभी भिक्षुओं के समूह

से कहा- ” मैंने जो कुछ अनुभव किया, उस सत्य और सिखावन

को जितना शब्द के द्वारा दिया जाना सम्भव था, वह सब कुछ तुम्हें दे

दिया लेकिन इस फूल के साथ, इस सिखावन की कुंजी मैंने आज

महाकाश्यप करे सौंप दी।

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मनुष्य होने की कला–(A bird on the wing)-प्रवचन-09

बिल्ली को बचाओ-प्रवचन-नौवां

मनुष्य होने की कला–(The bird on the wing)-ओशो की बोली गई झेन और बोध काथाओं पर अंग्रेजी से हिन्दी में रूपांतरित प्रवचन माला)

कथा: –

नानसेन ने भिक्षओं के दो समूह, को, एक बिल्ली के स्वामित्व के

लिए आपस में शोर करते और झगड्‌ते हुए पाया नानसेन उस घर में

गया और एक तेज धार की छुरी लेकर लौटा उसने बिल्ली को हाथ

में उठाकर भिक्षओं से कहा– ”तुममें से कोई भी यदि कोई अच्छा

और भला शब्द कहे तो तुम इस बिल्ली को बचा सकते हो

कोई भी ऐसे शब्द को न कह सका इसलिए नानसेन ने बिल्ली के

दो टुकड़े कर दिए और आधा-आधा भाग प्रत्येक समूह को दे दिया

शाम को जब जोशू मठ में लौटा तब जो कुछ भी हुआ कु नानसेन

ने उसे उसकी बाबत बताया

जोशू ने कुछ भी नहीं कहा:

उसने बस अपनी चप्पलें अपने सिर पर रखीं और चला गया

नानसेन से कहा– ” यदि तुम वहां रहे होते तो तुमने बिल्ली को बचा लिया होता ”

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मनुष्य होने की कला–(A bird on the wing)-प्रवचन-08

झेन का शास्त्र है कोरी किताब-प्रवचन-आठवां

मनुष्य होने की कला–(The bird on the wing)-ओशो की बोली गई झेन और बोध काथाओं पर अंग्रेजी से हिन्दी में रूपांतरित प्रवचन माला)

कथा: –

झेन सदगुरू मूनान का एक ही उत्तराधिकारी था, उसका नाम था-शोजू

जब शोजू झेन का प्रशिक्षण और अध्ययन पूरा कर चुका, मू-नान ने

उसे अपने कक्ष में बुलाकर कहा- ” मैं अब बूढ़ा हुआ और जहां तक

मैं जानता हूं, तुम्हीं अकेले ऐसे हो जो इस प्रशिक्षण को विकसित कर

आगे ले जाओगे। यहां मेरे पास एक पवित्र ग्रंथ है- जो सात पीढ़ियों

से एक सद्‌गुरु से दूसरे सदगुरु को सौपा गया है, मैंने भी अपनी समझ

के अनुसार-उसमें कुछ जोड़ा है यह ग्रंथ बहुत कीमती है और मैं इसे

तुम्हें सौंप रहा जिससे मेरा उत्तराधिकारी बन कर तुम मेरा प्रतिनिधित्व

शोजू? ने उत्तर- ” कृपया अपनी यह किताब अपने पास रखिए मैंने

तो आपसे अनलिखा झेन पाया है और मैं उसे ही पाकर आंनदिन हूं,

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

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मनुष्य होने की कला–(A bird on the wing)-प्रवचन-07

हैं साधारण होने का चमत्कार-प्रवचन-सातवां

मनुष्य होने की कला–(The bird on the wing)-ओशो की बोली गई झेन और बोध काथाओं पर अंग्रेजी से हिन्दी में रूपांतरित प्रवचन माला)

कथा:

जापानी सदगुरु इकीदो एक कठोर शिक्षक थे और उनके शिष्य
उससे डरते थे एक दिन उनका एक शिष्य दिन का समय बताने के
लिए मठ का घंटा बजा रहा था। समय के अनुसार वह घंटे पर एक
चोट करना भूल गया क्या? क्योंकि वह द्वार से गुजरती हुई एक सुंदर लड़की
को देख हाथ’ उस शिष्य की जानकारी में आए बिना इकीदो उसके
पीछे ही खड़ा था। इकीदो ने अपने डंडे से उस शिष्य पर प्रहार किया
इस आघात से उस शिष्य की हृदयगति रुक गई और वह मर गया
पुरानी परंपरा के अनुसार शिष्य अपना जीवन सदगुरू के नाम लिखकर
अपने हस्ताक्षर करके दे देने के लेकिन अब यह परंपरा समाप्त होते
हुए औपचारिकता रह गई है, सामान्य लोगों के द्वारा इकीदो की निंदा
की गई लेकिन इस घटना के बाद इकीदो के दस निकट शिष्य बुद्धत्व
को उपलब्ध हुए जो इकीदो के उत्तराधिकारी बने एक सदगुरू के
निकट बोध को प्राप्त होने वालों की यह संख्या असाधारण रूप से
काफी अधिक थी।

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मनुष्य होने की कला–(A bird on the wing)-प्रवचन-06

हैं साधारण होने का चमत्कार-प्रवचन-छठवां

मनुष्य होने की कला–(The bird on the wing)-ओशो की बोली गई झेन और बोध काथाओं पर अंग्रेजी से हिन्दी में रूपांतरित प्रवचन माला)

कथा:

एक दिन झेन सदगुरू बांके अपने शिष्यों के साथ शांति से बैठा

कुछ चर्चा- परिचर्चा कर रहा था, तभी एक दूसरे पंथ के धर्माचार्य ने

उसकी बात चीत में विध्न डाल दिया, यह पंथ चमत्कारों की शक्ति में

विश्वास रखता था और उसका मानना था कि मुक्ति पवित्र मंत्री के

निरंतर उच्चारण से मिलती है बांके ने चचा-परिचर्चा रोककर उस

धर्माचार्य से पूछा- ” आप क्या कहना चाहते है?”

उस धर्माचार्य ने शेखी बधारते हुए कहा- ” उसके धर्म के संस्थापक

नदी के एक किनारे पर खड़े होकर अपने हाथ में लिए हुए बुश से?

नदी के दूसरे किनारे पर खड़े अपने शिष्य के हाथ में थमे कोरे कागज

पर पवित्र नाम लिख सकते हैं।

फिर उस धर्माचार्य ने बांके से पूछा– ” आप क्या चमत्कार कर सकते हें?”

बांके ने उत्तर दिया- ” केवल एक हुई चमत्कार में जानता हूं, जब

मुझे भूख लगती है? मैं भोजन करता हूं और जब मुझे कम लगती है? मैं पानी पीता है।”

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मनुष्य होने की कला–(A bird on the wing)-प्रवचन-05

नए मठ के लिए सदगुरु कौन?-(प्रवचन-पांचवां) 

मनुष्य होने की कला–(The bird on the wing)-ओशो की बोली गई झेन और बोध काथाओं पर अंग्रेजी से हिन्दी में रूपांतरित प्रवचन माला)

कथा:

ह्याकूजो ने अपने सभी भिक्षुओं, को एक साध बुलाया वह उनमें

से एक को नए मठ के संचालन के लिए भेजना चाहता था जमीन पर

पानी से भरा एक जग रखते हुए उसने कहा- ” बिना इसका नाम

प्रयोग किए हुए कौन बता सकता है कि यह क्या है?”

प्रधान भिक्षु ने कहा- जिसे उस पद करे प्राप्त करने की आशा थी।

उसने कहा- ” कोई भी इसे लकड़ी कर खड़ा के तो नहीं कह सकता।”

दूसरे भिक्षु ने कहा– ” यह कोई तालाब नहीं है? क्योंकि इसे कहीं

भी ले जाया सकता है।

भोजन बनाने वाला भिक्षु जो पास ही खड़ा था, आगे बड़ा, उसने

जग को एक ठोकर मारी और चला गया।

ह्याकूजो मुस्कुराया और उसने कहा, ” भोजन बनाने वाला भिक्षु

ही नए मत का सदगुरु होगा

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मनुष्य होने की कला–(A bird on the wing)-प्रवचन-04

एक प्याला चाय पीजिए-(प्रवचन-चौथा) 

झेन बोध कथाएं-( A bird on the wing) 

मनुष्य होने की कला–(A bird on the wing) “Roots and Wings” –0-06-74 to 20-06-74 ओशो द्वारा दिए गये ग्यारह अमृत प्रवचन जो पूना के बुद्धा हाल में दिए गये थे।  उन झेन और बोध काथाओं पर अंग्रेजी से हिन्दी में रूपांतरित प्रवचन माला)

कथा:

झेन सदगुरू जोशू मठ में आए।

एक नए भिक्षु से पूछा- क्या मैंने तुमको पहले कभी देखा है?”

उस नए भिक्षु ने उत्तरदिया- जी नहीं श्रीमान? ”

जोशू ने कहा- तब आप एक कला चाय पीजिए।

जोशू ने फिर दूसरे भिक्षु की ओर मुड़कर पूछा- क्या मैंने तुमको

पहले कभी देखा है?”

उस दूसरे भिक्षु ने उत्तर दिया जी क्या श्रीमान? आपने वास्तव में

मुझे देखा है

जोशू ने कह?- ” तब आप एक प्याला चाय पिजिए

कुछ देर बाद मठ में भिक्षुओ  के प्रबंधक ने जोशू से पूछा- आपने

कोई भी उत्तर मिलने पर दोनों को ही चाय पीने का समान आमंत्रण

क्यों दिया?”

यह सुनकर जाशू चीखते हुए बोला- मैनेजर? तुम अभी भी यही

हरे?”

मैनेजर ने उत्तरदिया जी श्रीमान? ”

जोश ने कह?- ” तब आप भी एक प्याला चाय पीजिए।

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अजनबी तुम अपने से लगते हो-(कविता)-मनसा मोहनी  

अजनबी तुम अपने से लगते हो-(कविता)  

तड़प है परंतु दर्द कहां है उसमें,

वो तो एक एहसास है, पकड़ कहां है उसमें।

वो दूर है मगर दूर कहां है हमसें।

तार बिंधे है विरह के, राग कहां है इनमें।

पीर ने घेरा हमको, दर्द कहां है दिलमें

कुछ लोग कितने अनजान से होते है

परंतु कितने करीब होते है आपने

मानों वो मैं हूं और वो उसकी परछाई

कैसे एक याद की बदली घिर आई

मानों अभी वा पास आकर बैठ जाऐगा

और मिलेगे ह्रदय से ह्रदय के तार

तब बहेगे धार-धार आंसू के झरने Continue reading “अजनबी तुम अपने से लगते हो-(कविता)-मनसा मोहनी  “

मनुष्य होने की कला–(A bird on the wing)-प्रवचन-02

न मन न सत्य-(प्रवचन-दूसरा) 

झेन बोध कथाएं-( A bird on the wing) 

मनुष्य होने की कला–(A bird on the wing) “Roots and Wings” – 10-06-74 to 20-06-74 ओशो द्वारा दिए गये ग्यारह अमृत प्रवचन जो पूना के बुद्धा हाल में दिए गये थे।  उन झेन और बोध काथाओं पर अंग्रेजी से हिन्दी में रूपांतरित प्रवचन माला)

कथा:

डोको नाम के नए साधक ने सदगुरु के निकट आकर पूछा-

किस चित्त-दशा में मुझे सत्य की खोज करनी चाहिए?”

सदगुरू ने उत्तर दिया- वहां मन है ही नहीं, इसलिए तुम उसे

किसी भी दशा में नहीं रख सकते और न वहां कोई सत्य है? इसलिए

तुम उसे खोज नहीं सकते

डोको ने कहा- यदि वहां न कोई मन है और न कोई सत्य फिर

यह सभी शिक्षार्थी रोज आपके सामने क्यों सीखने के लिए आते हैं

सदगुरू ने चारों ओर देखा ओर कहा- में तो यहां किसी को भी

नहीं देख रहा। 

पूछने वाले ने अगला प्रश्न क्रिया- तब आप कौन है? जो शिक्षा

दे रहे है?”

सदगुरू ने उत्तर दिया- मेरे पास कोई जिह्वा ही नहीं फिर मैं

कैसे शिक्षा दे सकता हूं?”

तब डोको ने उदास होकर कहा- मैं आपका न तो अनुसरण

कर सकता हूं और न आप करे समझ सकता हूं

झेन सदगुरु ने कहा- मैं स्वयं अपने आपको नहीं समझ पाता।  

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मनुष्य होने की कला–(A bird on the wing)-प्रवचन-01

पहले अपना प्याला खाली करो-(प्रवचन-पहला)

झेन बोध कथाएं-( A bird on the wing)  

मनुष्य होने की कला–(A bird on the wing) “Roots and Wings” –0-06-74 to 20-06-74 ओशो द्वारा दिए गये ग्यारह अमृत प्रवचन जो पूना के बुद्धा हाल में दिए गये थे। उन झेन और बोध काथाओं पर अंग्रेजी से हिन्दी में रूपांतरित प्रवचन माला)

 कथा:

 जपानी सदगुरु ‘नानहन ने श्रौताओ से दर्शन शस्त्र के एक प्रोफेसर का परिचय कराया और तब अतिथि गृह के प्याले में वह उनके लिए चाय उड़ेलते ही गए।

भरे प्याले में छलकती चाय को देख कर प्रोफेसर अधिक देर अपने करे रोक न सके। उन्होंने कहा- ” कृपया रुकिए प्याला पूरा भर चुका है। उसमें अब और चाय नहीं आ सकती।”

नानइन ने कहा- ”इस प्याले की तरह आप भी अपने अनुमानों और निर्णयों से भरे हुए हैं जब तक पहले आप अपने प्याले को खाली न कर लें, मैं झेन की ओर संकेत कैसे कर सकता हूं?”

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मनुष्य होने की कला–(A bird on the wing)-ओशो

झेन बोध कथाएं-( A bird on the wing)-ओशो   

मनुष्य होने की कला–(A bird on the wing) “Roots and Wings” – 10-06-74 to 20-06-74 ओशो द्वारा दिए गये ग्यारह अमृत प्रवचन जो पूना के बुद्धा हाल में दिए गये थे। उन झेन और बोध काथाओं पर अंग्रेजी से हिन्दी में रूपांतरित प्रवचन माला)

इस पुस्तक से:

ज़ेन सदगुरू हाकुई के निकट आगर एक समुराई योद्धा ने पूछा—‘क्या यहां स्वर्ग और नर्क जैसी कुछ चीज है?’

हाकुई ने पूछा: ‘तुम कौन हो?’

उस योद्धा न उत्तर दिया-‘मैं सम्राट की सुरक्षा में लगा समुराई योद्धाओं का प्रधान हूं।’

हाकुई ने कहा: ‘तुम और समुराई? अपने चेहरे से तो तुम एक भिखारी अधिक लगते हो।’ Continue reading “मनुष्य होने की कला–(A bird on the wing)-ओशो”

शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-प्रवचन-10

भूत, भविष्य और वर्तमान के पार-(प्रवचन-दसवां) ओशो

Hsin Hsin Ming (शुन्य की किताब)–ओशो

(ओशो की अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद) 

सूत्र:

यहां शून्यता? कहा शून्यता

लेकिन असीम ब्रह्मांड सदा तुम्हारी आंखों के सामने रहता है
असीम रूप से बड़ा, असीम रूप से छोटा;

कोई भेद नहीं है

क्योंकि सभी परिभाषाएं तिरोहित हो गई हैं

और कोई सीमाएं दिखाई नहीं देतीं।

होने और न होने के साथ भी ऐसा है।

उन संदेहों और तर्कों में समय को मत गंवाओ

जिनका इसके साथ कोई संबंध नहीं है।

 एक वस्तु, सारी वस्तुएं

बिना किसी भेदभाव के एक- दूसरे में गति करती हैं और
घुल- मिल जाती हैं।

इस बोध में जीना अपूर्णता के विषय में चिंतारहित होना है।
इस आस्था में जीना अद्वैत का मार्ग है

क्योंकि अद्वैत व्यक्ति वह है जिसके पास श्रद्धावान मन है।

 अनेक शब्द।

मार्ग भाषा के पार है

क्योंकि उसमें न बीता हुआ कल है
न आने वाला कल है न आज है।
Continue reading “शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-प्रवचन-10”

शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-प्रवचन-09

अद्वैत-(प्रवचन-नौवां) ओशो

Hsin Hsin Ming (शुन्य की किताब)–ओशो

(ओशो की अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद)

सूत्र:

 तथाता के इस जगत में न तो कोई स्व है और न ही स्व के अतिरिक्त कोई और।

इस वास्तविकता से सीधे ही लयबद्ध होने के लिए-जब संशय उठे, बस कहो, ‘अद्वैत।

इस ‘अद्वैत’ में कुछ भी पृथक नहीं है कुछ भी बाहर नहीं है।

कब या कहा कोई अर्थ नहीं रखता; बुद्धत्व का अर्थ है इस सत्य में प्रवेश।

और यह सत्य समय या स्थान में घटने- बढ़ने के पार है;

इसमें एक अकेला विचार भी दस हजार वर्ष का है।

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शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-प्रवचन-08

सच्ची श्रद्धा का जीवन-(प्रवचन-आठवां) ओशो

Hsin Hsin Ming (शुन्य की किताब)–ओशो

(ओशो की अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद) 

 सूत्र:

 गति को स्थिरता और स्थिरता को गतिमय समझो,

और गति और स्थिरता की दशा दोनों विलीन हो जाती हैं।
जब द्वैत नहीं रहता, तो अद्वैत भी नहीं रह सकता।

इस परम अंत की अवस्था पर कोई नियम,

या कोई व्याख्या लागू नहीं होती।

मार्ग के अनुरूप हो चुके अखंड मन के लिए

सभी आत्म- केंद्रित प्रयास समाप्त हो जाते हैं।

संदेह और अस्थिरता तिरोहित हो जाते हैं

और सच्ची श्रद्धा का जीवन संभव हो जाता है।

एक ही प्रहार से हम बंधन से मुक्त हो जाते हैं;

न हमें कुछ पकड़ता है और न हम कुछ पकड़ते हैं।

मन की शक्ति के प्रयास के बिना,

सभी कुछ शून्य है स्पष्ट है स्व-प्रकाशित है।

यहां विचार, भाव, ज्ञान, और कल्पना का कोई मूल्य नही

गति को स्थिरता और स्थिरता को गतिमय समझो,

और गति और स्थिरता की दशा दोनों विलीन हो जाती हैं। Continue reading “शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-प्रवचन-08”

शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-प्रवचन-07

सभी स्वप्न समाप्त हो जाने चाहिए-(प्रवचन-सातवां) ओशो

Hsin Hsin Ming (शुन्य की किताब)–ओशो

(ओशो की अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद) 

सूत्र:

शांति और अशांति भ्रांति के परिणाम है;

बुद्धत्व के साथ कोई पसंदगी और नापसंदगी नहीं होती।
सभी द्वैत अज्ञानपूर्ण निष्कर्ष से आते हैं।

वे ऐसे हैं जैसे कि सपने या आकाश- कुसुम;

उन्हें पकड़ने की चेष्टा करना मूढ़ता है।

लाभ और हानि, उचित और अनुचित,

अंत में ऐसे विचार तत्काल समाप्त कर देने चाहिए।

 अगर आंख कभी नहीं सोती,

तो स्वभावत सारे स्वप्न समाप्त हो जाएंगे।

अगर मन कोई भेद नहीं करता,

दस हजार चीजें जैसी वे है? एक ही तत्व की हैं।
इस एक तत्व के रहस्य को समझ लेना Continue reading “शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-प्रवचन-07”

शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-प्रवचन-06

लक्ष्य के लिए प्रयास न करे-(प्रवचन-छठवां)

Hsin Hsin Ming (शुन्य की किताब)–ओशो

(ओशो की अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद) 

सूत्र:

महापथ में जीना न तो सरल है न कठिन,

लेकिन वे जिनके विचार सीमित हैं वे भयभीत और संकल्पहीन हैं।

जितनी तीव्रता से वे शीघ्रता करते हैं उतना ही वे धीमे जाते हैं

और पकड़ सीमित नहीं हो सकती,

संबोधि के विचार से आसक्त हो जाना भी भटक जाना है।

बस वस्तुओं को अपने ढंग से होने दो और फिर न आना होगा, न जाना।

 

वस्तुओं के स्वभाव (तुम्हारे अपने स्वभाव) के अनुसार चलो;

और तुम मुक्त भाव से और अविचलित रह कर चलोगे।

जब विचार बंधन में होता है सत्य छिपा रहता है

क्योंकि सभी कुछ धुंधला और अस्पष्ट होता है

और निर्णय करने का बोझिल अभ्यास कष्ट और थकान लाता है।
भेदभावों और विभाजनों से क्या लाभ हो सकता है?
Continue reading “शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-प्रवचन-06”

हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्-(प्रवचन-05)

हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्

पांचवां प्रवचन-(ध्यान और रेचन)

प्रश्नः कई लोगों के मन में ऐसा ख्याल है कि तीन दिनों के शिविर से क्या हो सकता है। इंसान के जीवन में इतनी आसानी से कैथार्सिस वगैरह हो जाती है और इसकी कोई आवश्यकता वगैरह है कि ध्यान खुद ही अपने आप ही आ सकता है? इसके बारे में कृपया बताएं।

ध्यान आ सकता है, स्वयं से भी आ सकता है, लेकिन पृथक्करण से नहीं आएगा। बड़ा सवाल यह नहीं है कि हम अपने मन को एनालाइज कर दें, क्योंकि यह पृथक्करण विश्लेषण करते वक्त कहीं हमारा मन ही तो नहीं है। और यह सारा पृथक्करण हमारे ही मन को दो खंडों में तोड़ देता है। तो न तो पृथक्करण से संभव है कि मन एक हो जाए, न ही चिंतन-मनन से संभव है कि एक हो जाए। क्योंकि ये सारी क्रियाएं जिस मन से चलने वाली हैं, उसी मन को बदलना है। Continue reading “हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्-(प्रवचन-05)”

हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्-(प्रवचन-04)

हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्

प्रवचन-चौथा-(मन के पार)

Published as a booklet in 1972

प्रश्नः क्या निराकार वस्तु का ध्यान हो सकता है? और यदि हो सकता है तो क्या निराकार, निराकार ही बना रहेगा?

ध्यान का साकार या निराकार से कोई भी संबंध नहीं है। ध्यान का विषय-वस्तु से ही कोई संबंध नहीं है। ध्यान है विषय-वस्तु रहितता। प्रगाढ़ निद्रा की भांति।

लेकिन निद्रा में चेतना नहीं है। और ध्यान में चेतना पूर्णरूपेण है। अर्थात निद्रा अचेतन ध्यान है। या ध्यान सचेतन निद्रा है।

प्रगाढ़ निद्रा में भी हम वहीं होते हैं जहां ध्यान में होते हैं, लेकिन मूर्च्छित। ध्यान में भी हम वहीं होते हैं जहां निद्रा में होते हैं, लेकिन जाग्रत।

जागते हुए सोना ध्यान है। या सोते हुए जागना ध्यान है। Continue reading “हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्-(प्रवचन-04)”

हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्-(प्रवचन-03)

हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्

तीसरा प्रवचन-(ध्यानः अंतस अनुभूति)

 प्रश्नः मैं थोड़ी साधना करती हूं, खास कर उसके बारे में मुझे पूछना है।

साधना करेगी फिर तो पूछ ही न सकेगी। साधना इतनी और उतनी नहीं होती। मात्रा होती नहीं। यह हमारी बड़ी भ्रांति है। क्योंकि हम चीजों की दुनिया से परिचित हैं, इसलिए हमेशा क्वांटिटी के हिसाब से सोचते हैं। चीजों की दुनिया से परिचित होने के कारण यह भ्रांति होती है, क्योंकि चीजों में तो क्वांटिटी है और भीतर सिर्फ क्वालिटी है, क्वांटिटी नहीं है! भाव की दुनिया में कोई मात्रा नहीं है। इसलिए हम ऐसा नहीं कह सकते कि हम किसी को कम प्रेम करते हैं। या तो करते हैं या नहीं करते हैं। कम और ज्यादा प्रेम नहीं हो सकता। हो ही नहीं सकता। क्योंकि वहां नापने का उपाय ही नहीं है। या तो हम प्रेम करते हैं या हम नहीं करते हैं। कम प्रेम धोखे की बात है। ऐसे ही या तो हम साधना में जाते हैं या नहीं जाते हैं। कम साधना धोखे की बात है। लेकिन चूंकि हम वस्तुओं की दुनिया में ही जीते हैं और हमारा सारा चिंतन वहां से बनता है, तो वहां मात्राएं हैं। और उन्हीं मात्राओं को हम अध्यात्म में भी ले आते हैं, तब बड़ी भूल हो जाती है, तब बड़ी भूल हो जाती है। Continue reading “हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्-(प्रवचन-03)”

शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-05

मूलस्त्रोत की और लोटना-(प्रवचन-पांचवां)

Hsin Hsin Ming (शुन्य की किताब)–ओशो

(ओशो की अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद) 

सूत्र:

जब विचार के विषय विलीन हो जाते है

विचार करने वाला भी विलीन हो जाता है;

जैसे मन विलीन हो जाता है विषय भी विलीन हो जाते है।

वस्तुएं विषय बनती है क्योंकि भीतर विषयी मौजूद है;

वस्तुओं के कारण ही मन ऐसा है। इन दोनों की सापेक्षता को,

और मौलिक सत्य शून्यता की एकात्मकता को समझो।
इस शून्यता में इन दोनों की अलग पहचान खो जाती है

और प्रत्येक अपने आप में संपूर्ण संसार को समाए रहता है
अगर तुम परिष्कृत और अपरिष्कृत में भेद नहीं करते,

तो तुम पूर्वाग्रहों और धारणाओं का मोह नहीं करोगे। Continue reading “शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-05”

हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्-(प्रवचन-02)

हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्

दूसरा प्रवचन—(ध्यानः एक वैज्ञानिक दृष्टि)

मेरे प्रिय आत्मन्!

सुना है मैंने, एक खतरनाक तूफान में कोई नाव उलट गई थी। एक व्यक्ति उस नाव में बच गया और एक निर्जन द्वीप पर जा लगा। दिन, दो दिन, चार दिन, सप्ताह, दो सप्ताह उसने प्रतीक्षा की कि जिस बड़ी दुनिया का वह निवासी था वहां से कोई उसे बचाने आ जाएगा। फिर महीने भी बीत गए और वर्ष भी बीतने लगा। फिर किसी को आते न देख कर वह धीरे-धीरे प्रतीक्षा करना भी भूल गया।

पांच वर्षों के बाद कोई जहाज वहां से गुजरा। उस एकांत निर्जन द्वीप पर उस आदमी को निकालने के लिए जहाज ने लोगों को उतारा। और जब उन लोगों ने उस खो गए आदमी को वापस चलने को कहा, तो वह विचार में पड़ गया। उन लोगों ने कहा, क्या विचार कर रहे हैं! चलना है या नहीं? तो उस आदमी ने कहा, अगर तुएहारे साथ जहाज पर कुछ अखबार हों, जो तुएहारी दुनिया की खबर लाए हों, तो मैं पिछले दिनों के कुछ अखबार देख लेना चाहता हूं। Continue reading “हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्-(प्रवचन-02)”

हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्-(प्रवचन-01)

हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्-ओशो

पहला प्रवचन-मेडिसिन और मेडिटेशन

मेरे प्रिय आत्मन्!

मनुष्य एक बीमारी है। बीमारियां तो मनुष्य पर आती हैं, लेकिन मनुष्य खुद भी एक बीमारी है। मैन इ.ज ए डिस-ई.ज। यही उसकी तकलीफ है, यही उसकी खूबी भी। यही उसका सौभाग्य है, यही उसका दुर्भाग्य भी। जिस अर्थों में मनुष्य एक परेशानी, एक चिंता, एक तनाव, एक बीमारी, एक रोग है, उस अर्थों में पृथ्वी पर कोई दूसरा पशु नहीं है। वही रोग मनुष्य को सारा विकास दिया है। क्योंकि रोग का मतलब यह है कि हम जहां हैं, वहीं राजी नहीं हो सकते। हम जो हैं, वही होने से राजी नहीं हो सकते। वह रोग ही मनुष्य की गति बना, रेस्टलेसनेस बना। लेकिन वही उसका दुर्भाग्य भी है, क्योंकि वह बेचैन है, परेशान है, अशांत है, दुखी है, पीड़ित है। Continue reading “हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्-(प्रवचन-01)”

शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-प्रवचन-04

शुन्यता ही एकात्मा है-(प्रवचन-चौथा)

Hsin Hsin Ming (शुन्य की किताब)–ओशो

(ओशो की अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद) 

सूत्र:

मूल की ओर लौटना अर्थ को पा लेना है

लेकिन आभासों के पीछे जाना स्रोत से चूक जाना है।

आंतरिक बुद्धत्व के क्षण में दृश्य और खालीपन का अतिक्रमण होता है।

जो परिवर्तन इस शून्य जगत में दिखाई देते हैं

उन्हें हम अपने अज्ञान के कारण वास्तविक मानते हैं।

सत्य के लिए खोज मत करो;

केवल धारणाओं को पकडना छोडू दो।

 द्वैत की स्थिति में मत रहो;

ऐसे पथों से सावधानीपूर्वक बचो।

यदि यह और वह:उचित और अनुचित इसका थोड़ा सा निशान भी रहे,

तो मन का सार- तत्व उलझन में खो जाएगा।

यद्यपि सभी द्वैत एक से ही आते है इस एक से भी आसक्त मत हो जाओ। Continue reading “शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-प्रवचन-04”

शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-प्रवचन-03

बोलना और सोचना छोड़ दो-(प्रवचन-तीसरा)

Hsin Hsin Ming (शुन्य की किताब)—-ओशो

(ओशो की अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद) 

सूत्र:

वस्तुओं के यथार्थ को अस्वीकार करना,

उनकी वास्तविकता से चूक जाना है;

यह कहना कि वस्तुएं असार हैं

उनकी वास्तविकता से फिर चूक जाना है।

जितना तुम सत्य के विषय में बोलते और सोचते हो,
उतना ही तुम उससे दूर भटक जाते हो।

बोलना और सोचना छोड़ दो,

तो फिर ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे तुम न जान सकोगे।

वास्तविकता सदा से वहां है बस तुम्हारे हृदय के निकट, तुम्हारी आंखों के निकट, तुम्हारे हाथों के निकट प्रतीक्षा करती हुई। तुम उसे छू सकते हो तुम उसे अनुभव कर सकते हो, तुम उसे जी सकते हो-लेकिन तुम उसका चिंतन नहीं कर सकते। देखना संभव है अनुभूति संभव है, स्पर्श संभव है लेकिन सोच-विचार करना संभव नहीं है। विचार-प्रक्रिया की प्रकृति को समझने की कोशिश करो। विचार सदा किसी के विषय में होता है, वह कभी सीधा-सीधा नहीं होता। तुम वास्तविकता को देख सकते हो, लेकिन तुम्हें इसके विषय में सोचना पड़ेगा और ‘ विषय में ‘ एक जाल है, Continue reading “शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-प्रवचन-03”

शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-प्रवचन-02

मार्ग परिपूर्ण है–प्रवचन–दूसरा

Hsin Hsin Ming (शुन्य की किताब)–ओशो

(ओशो की अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद)

सूत्र:

जब चीजों का गहन अर्थ समझा नहीं जाता,

तब मन की सारभूत शांति अकारण ही विचलित हो जाती है।

महापथ है विराट आकाश की भांति

जहां न कुछ कम है न ही कुछ अधिक।

सच तो यह है कि स्वीकार या अस्वीकार करने के अपने चुनाव के कारण,

हम चीजों के वास्तविक स्वभाव को नहीं देखते।

न तो बाहरी वस्तुओं की उलझनों में जीओ?

न ही आंतरिक शून्यता की अनुभूति में।

कृत्य की कामना मत करो और यह जान कर कि सब–

कुछ एकात्म है शांत हो जाओ

और ऐसे भ्रांतिपूर्ण विचार स्वत? ही विदा हो जाएंगे।

जब तुम अक्रिया को पाने के लिए कर्म को रोकने का प्रयास करते हो
तो तुम्हारा वही प्रयास तुम्हें क्रिया से भर देता है।
Continue reading “शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-प्रवचन-02”

शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-प्रवचन-01

महापथ कठिन नहीं है–पहला प्रवचन

सूत्र:

महापथ उनके लिए कठिन नहीं है

जिनकी अपनी कोई प्राथमिकताएं नहीं हैं।

जब प्रेम और घृणा दोनों नहीं होते,

सब–कुछ सुस्पष्ट होता है और कुछ भी छिपा नहीं रहता।

थोड़ा सा भेद और पृथ्वी और स्वर्ग में

अनंत दूरी हो जाती है।

अगर तुम सत्य को देखना चाहते हो,

तो पक्ष या विपक्ष में राय मत बनाओ।

तुम्हारी पसंद और नापसंद

का संघर्ष ही मन का रोग है। Continue reading “शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-प्रवचन-01”

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